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खौपनाक २०२०

चारो तरह है कोरोना , कभी धुप की गर्मी करे सितम ,फिर आया सावन झूम के ,साथ में लाया बिजली का जखम ,बादल घूम  रहे थे ऐसे , जैसे - दौड़ में हार  न जाए ,बरस रहे थे गरज- गरज ,किसान परेशान थे हर तरफ ,
बंजर में भी हरियाली थी ,फिर भी सुबह  में न लाली  थी। पैसे हाथ से जा  रहे थे आक्रोश से लोग चिल्ला रहे थे,हर तरफ लाचारी थी। कही खून मर्डर हो रहे थे ,कही चोरी की तैयारी थी ,२०२० से न यारी थी। भागे लोग शहर से गांव , गांव में भी आँधियो साथ बारिश तूफानी थी ,लोग खुद को लगे बचाने ,सबको जान अपनी प्यारी थी ,२०२० को भगाने में जमकर अब तैयारी थी 


जय हिन्द 











मैं खुद नहीं चलता साहब मुझे ये चलाता हैं

मैं खुद नहीं चलता साहब मुझे ये चलाता  हैं हर सुबह हर शाम एक नई सबक दे जाता है ,रुकता है ये पास जिसके बादशाह वो बन जाता है ,हाथो की रेखाएं बनकर किस्मत नाम दे जाता है
यू तो कराता  है कड़ी मेहनत फिर "खुद "को दे जाता है 
मैं खुद नहीं चलता साहब मुझे तो ये चलाता है। 
रुकता नहीं पास उसके ,आलस है पास जिसके बून्द -बून्द से घड़ा भरता है ,खुद को बून्द बताता है 
जहा होती  है इसकी हस्ती बना लेता है वही ये बस्ती ,है अकड़ इसके भी अंदर ,दिखाता है   डुबाकर कस्ती ,हर पल हर जगह क्यों ? ये अकड़ दिखाता है 
मैं खुद  नहीं चलता साहब मुझे ये चलाता है। 
मिल जाए बिन मांगे तो नाज करना तुम किस्मत पे ,वरना चप्पलें घिसकर 'दो' वक्त की रोटी देता है 
बड़े मजे मजे में ही सबको  नाच नचाता है ,रूपया पैसा धन दौलत कई नाम से जाना जाता है। 

















एक" हां" ने कितना कुछ बदल दिया

1- चलो माना की हम तुम्हारे काबिल नहीं है , फिर  तारीफ पे तारीफ करके मेरा दिल क्यों जीता था।2 -छुपते  छुपता नहीं है आसु,फिर भी छुपा लेती हु,अकेले में  आये तो गुमनाम ,महफिर में आये तो ख़ुशी का नाम देती हु  
3 -अगर मै  सही थी तो रोना तुझे भी पड़ेगा ,अगर है तू सही तो घबराता क्यों है। 4 - तुमने जो देखा मुझे वो मै  नहीं तुम्हारा वहम है ,दिख गई मै  तुम्हे ये  मेरा तुमपे रहम है,सुकर मनाओ अपने  ख़ुशी की  ये नारी शक्ति है इसलिए जुल्मो का सहन है। 5 -कभी -कभी सोचती हु की एक हां ने   कितना कुछ बदल दिया ,मासूमियत ,ख़ुशी, जज्बात ,प्यार, विस्वास ,बस एक तुम्हे ही बदल नहीं पायी। 
जय हिन्द 



































ये वक्त ही तो हैं साहब ,एक दिन बदल जायेंगे ।

लड़कर ही परिस्थितियों से मजबूत खुद को बनायेंगे  , ये वक्त ही तो हैं साहब ,एक दिन बदल जायेंगे । ये  सोचकर मेहनत करते है ,बदलेंगे  दिन अपने , क्या पता सच हो जाए  ,कहाँ  जाकर सपने। समय  होता हैं बहुत चंचल ,ये भी लौटकर आता है ,सितम न करो साहब समय सब  कुछ नहीं भूल पाता है। संभलकर डालो बीज काटो का ,तुम्हे भी चुभ जायेंगे ये वक्त ही तो है साहब ,एक दिन बदल जायेंगे । 

जय हिन्द 




हवा ने कुछ यू कहाँ -

तेज चलो या धीमे चलो पर तुम चलते चलो,चलोगे तेज मिशाल बनोगे ,कमजोर में ताकत भरोगे। बिखरे को समेटोगे ,टूटे को जोड़ोगे ,बंद रास्ते को भी एक नई रास्ते में मोड़ोगे,हैं ये ' कठिन' काम इस शब्द को  भी पीछे छोड़ोगे। 
तेज चलो या  धीमे     . . . . . . . . .  . . . . चलते चलो।।
पानी अगर डरता तो झरने से नहीं गिरता वो ,न प्यास बुझाता न सीन दर्शाता ,न पिने योग्य रह जाता । जो आया है उसे जाना है ,फिर  कुछ नया करने से क्यों घबराना है। हवा ने भी माना है ,तेज चलो या धीमे चलो पर तुम चलते चलो। 
जैसे -घुमक्कड़ घूम कर हर चीज को पहचाना है अपने मस्तिष्क को सिखने में लगाकर उसको जंग लगने से बचाना है

रखो जूनून ऐसा की कुछ कर के ही जाना है। 

हवा ने भी माना  है , तेज चलो या धीमे चलो पर तुम चलते चलो। 



जय हिन्द 























ऐ कलम तुझसे तो इतिहास लिखा है तुझसे दर्द कहा छुपा है

मन उदास था हाथ में कलम थी आखो में आसुओ संग , होठ पे मुस्कुराहट थी। दिमाक परेशान था लिखू क्या मै ,दिल कलम चलाते जा  रहा था ' छोड़ू क्या ? मै 'दिल कलम से अपना हाल बता रहा था ,  दिल कहता है मैंने दुनिया देखि है पास से ,जीते भी है यहा  मरते भी है ,मारते भी है शब्दों के बाण  से। 
ऐ 'कलम' यहा ठोकर लगते है कदम पे कदम ,किसी को सच खा गया तो किसी को झूठ खा गया ,बचा वो भी नहीं जो ये दोनों दबा गया। 
खुश तो वो भी नहीं  जो है बहुत अमीर ,
रोता है वो भी जो चलता है 'भिक्षु' के लिए  मिलो दूर। ए कलम तुझसे तो इतिहास लिखा है ,तुझसे दर्द कहा छुपा है। 

जय हिन्द 









dowry

है तू बहुत खुद्दार ,मजबूर कर देता है लेने  को उधार।थोड़ा सा भी कम  पड़ा तो  ,बिच में लटका देता है अरमान। एक मिनट में अपनी शक्तियों से ,ला देता है बड़े -बड़े लोगो में बदलाव। होता है प्यार दो दिलो में , फिर तू क्यों कर   देता है  अलगाव। 
उतार देता है माँ बाप की पगड़ी ,बेटी की कर देता है दुःख भरी जिंदगी। तुझे किस नाम से पुकारू , " हु "बेखबर ,होना है तुझसे रूबरू । माँ की ममता को खा गया तू ,बाप की कमाई खा गया तू ,भाई ने सपने नहीं देखे , और तू कहता है  'और ' दे - दे। खुश हो जाते है लोग तुझे पाकर ,घुट -घुट कर जीती है वो बेटी तेरे घर आकर। 
तू कहता है गाड़ी चाहिए नहीं तो शादी को  'ना'  कर। 
सुन ऐ  समाज के रिवाज ,
तू बहुत तुच्छ है। 
जो पाया तुझे ,उसका भूख नहीं मिटा ,
जो दिया तुझे वो भूख से मर मिटा। दोस्तों पढ़ लिखकर तुम  करना इसका परहेज ,
रुला देता है  माँ - बाप को इसका नाम है "दहेज़"।